रविवार, 23 सितंबर 2007

वन हण्ड्रेड इयर्स ऑफ सालीटयूड और मार्खेज़

मार्खेज़ का प्लीनीयो मेन्दोज़ा द्वारा लिया गया साक्षात्कार पढ़ा, गद्य के जादू को अगर महसूस करना है तो इस उपन्यास को पढ़ें, यह एक ऐसा उपन्यास है जो वृहत होने के बावजूद आपको एक भी पृष्ठ छोड़ने की स्वतंत्रता नहीं देता। पहले-पहल जब जादुई यथार्थवाद के बारे में सुना या पढ़ा था तो इस फ्रेज़ के इस्तेमाल पर खुद को पर चकराने से नहीं रोक सका था, पर उपन्यास पढ़ने के बाद समझ में आया कि वाकई ऐसा भी कुछ सम्भव है। एक साथ अथाह और उदात्त सौन्दर्य के साथ महान वीभत्सता और क्रूरता इस आख्यान में ही सम्भव है। मेल्कीयादेस और अन्य बंजारों के चमत्कारों से लेकर फर्नान्दा का धार्मिक आचरण जो सिर्फ सोने की राजचिह्न वाली चिलमची में शौच करती है, यह सभी कुछ अकल्पनीय है, लेकिन फिर भी मार्खेज़ उसे इतिहास की तरह लिखते हैं और मजबूर करते हैं कि उस पर विश्वास किया जाए। मार्खेज़ ने साक्षात्कार में कहा है कि ''मैं मज़े के लिए लिखने के जाल में फँसा और उसके बाद असल में जहाँ मैंने पाया कि दुनिया में लिखने से अधिक प्रिय मुझे कुछ नहीं था।'' यह बात बड़ी महत्तवपूर्ण है कि एक लेखक जो मज़े के लिए लिखना शुरू करता है उसकी कृति एक बड़े और विस्तृत औपनिवेशिक इतिहास और सांस्कृतिक विमर्श के फलक तक पहुँचती है। मैंने पढ़ते समय यह हमेशा महसूस किया है कि एक ऐसी कृति जो आपको अपने साथ अपने संसार, अपने समय में साथ ले जाती है, वह अनूठी होती है। गाबो (मार्खेज़ का दूसरा नाम) को पढ़ते हुए आपको ऐसा लगेगा कि आप माकोन्दो में ही रह रहे हैं। ओरैलियानो बुएनदीया के उधमी (और उद्यमी भी) परिवार वाले और स्वेटर बुनती हुई उर्सुला का प्रतीक ऐसा चुम्बकीय है कि उपन्यास खत्म होने के बाद माकोन्दो छोड़ते हुए दुख सा होता है। अलग होते हुए भी उपन्यास का संसार इतना यथार्थ बुनता है कि रूपवती रेमेदियोस के स्वर्गारोहण का जादू भी असत्य नहीं लगता। सिर्फ वक्त काटने के लिए कर्नल औरेलियानो का सुनहरी मछलियाँ बनाना और बाद में उन्हें गला देना, ये कुछ ऐसे विवरण हैं, जो आपको फंतासी के करीब लगेंगे लेकिन विश्वास मानिये मार्खेज़ को फंतासी से वितृष्णा है, वे कहते हैं, ''सादा फंतासी जिसका कोई वास्तविक आधार नहीं होता, मुझे बेहद नापसंद है ..... कल्पना और फंतासी के बीच वहीं अंतर है जो एक मनुष्य और वेन्ट्रिलोकिट के पुतले में होता है।''
उपन्यास की विशेषताओं के अतिरिक्त कुछ ख़ास बातें मार्खेज़ की निजी लेखन शैली के बारे में भी बड़ी रोचक हैं, जैसे इस उपन्यास के बारे में सोचने में उन्हें पन्द्रह साल लगे और अन्त में लगभग दो सालों में उन्होंने इसे लिखा। उनके अनुसार अगर कोई विचार पन्द्रह साल से तीस साल तक टिका रह सकता है तो उसे लिखने के सिवाय मेरे पास कोई चारा नहीं। मार्खेज कहते हैं कि उन्हें सुबह रेगिस्तान के द्वीप की चाहिए और रात एक बड़े शहर की जहाँ कुछ अच्छी ड्रिंक्स और दोस्त मिल सकें। लिखते समय वे आश्चर्यजनक रूप से बहुत सारे पन्ने फाड़ते हैं और उन्हें लगता है कि टाइप करते समय उनसे हुई गलती रचनात्मक निर्णय की गलती के बराबर होती है। मार्खेज़ के अनुसार वे बहुत किस्मत वाले हुए तो पूरे दिन में एक पैराग्राफ लिख पाते हैं। मजेदार बात यह कि मार्खेज़ कभी कभी लिखते हुए अचानक लिखने की अवस्था से बाहर आ जाते हैं और ऐसे समय में वे पेंचकस लेकर घर भर के ताले और प्लग ठीक करने लगते हैं या दरवाज़ों पर हरा रंग करते हैं। वस्तुत: यह खुद को री-सेट करने जैसी प्रक्रिया होती है।
यूँ तो यह उपन्यास और मार्खेज़ से जुड़ी हर बात रोचक और मज़ेदार है, लेकिन मेरी संस्तुति यह है कि हर गद्य लेखक को ज़रूरी तौर से मार्खेज़ को अवश्य पढ़ना चाहिए। गद्य का प्रवाह, बाँधे रखने की कला और यथार्थ को रोचक स्वरूप में विन्यस्त कर प्रस्तुत करना वहाँ से सीखा जा सकता है।

7 टिप्‍पणियां:

DUSHYANT ने कहा…

आप की बात विश्वसनीय लग रही है, पढने का मन कर रहा है , ज़रूर पढूंगा ,बांटते रहें

रवि सुंदरम ने कहा…

नालायक, गधे, इतने दिन तक कहां गायब रहे. और अगर ब्लाग लिख रहे हो तो कम से कम हमें भी याद कर लेते. इतना ही नहीं दुनिया भर के लिकं दे दिए और मेरे ब्लाग को देखा ही नहीं.
दोस्त बुरा मत मानना... तुम्हें नेट पर देखकर मुझे इतना गुस्सा आया कि यही सच्चे मन से यही संबोधन निकला. मैंने इस बीच तुम्हें बहुत याद किया, तुमने न तो फोन किया न कुछ.. बहरहाल मैं अब बैंगलोर की एक साफ्टवेयर कंपनी में एडीटर हूं. मेरे पोर्टल हैं
http//:thatshindi.oneindia.in
www.aol.in/hindi
मेरे दोनों पोर्टल में साहित्य के सेक्शन में लिखने को काफी स्पेस है.
मुझे मेल करो-
dinesh.s@greynium.com

Bhupen ने कहा…

कहां गायब हो गुरु. एक फोन ही कर लो यार. तुम्हारा नंबर मेरे पास नहीं है. मेरा नंबर है-9999169886

मनीषा पांडे ने कहा…

आपके लेख पढ़कर 100 इयर्स ऑफ सॉलीट्यूड और मार्खेज की यादें ताजा हो आईं। दो साल पहले पढ़ी थी ये किताब और जब पढ़ रही थी, तो हॉस्‍टल में केरल से आई एक लड़की ने बड़ी रोचक जानकारी दी या कम-से-कम मेरे लिए यह जानना काफी एक्‍साइटिंग था कि वह इस किताब को मलयालम अनुवाद में कई साल पहले पढ़ चुकी थी। हिंदी में ये किताब अभी दो साल पहले ही प्रकाशित हुई है। मलयालम में 10 साल से है। जाने-अनजाने अपनी भाषा की सीमाएं पता चलती रहती हैं। फिलहाल आपने लिखा अच्‍छा है। मार्खेज और 100 इयर्स ऑफ सॉलीट्यूड न पढ़ा तो क्‍या पढ़ा।

विशाल श्रीवास्तव ने कहा…

शशि जी, यह तो हूबहू मेरी पोस्ट है 17 अगस्त 2007 की ....
कम से कम अपने ब्लाग पर डालने से पहले मुझसे पूछ लिया होता कम से कम कर्टसी ही दे दी होती .. यह तो ठीक नहीं है
मेरे ब्लाग पर यह पोस्ट यहां है ....
http://nayasamay.blogspot.com/2007/08/blog-post.html

गुस्ताखी माफ ने कहा…

वाह! क्या पोस्ट चुरायी है!

काकेश ने कहा…

इस तरह चोरी करना सही नहीं है जी. कृपया मूल लेखक का उल्लेख कर दें.